मैं एक साधारण परिवार की लड़की हूँ। वाराणसी के एक घनी आबादी में रहती हूँ। मुझे भी सब वही शौक हैं जो एक जवान लड़की के होते हैं। मेरे परिवार में बस मेरी मां है, पिता की याद मुझे नहीं है, मैं जब बहुत छोटी थी वो एक हादसे में गुजर गये थे। मेरे पड़ोस के ही एक लड़के से मैं प्यार करती थी।
उसका नाम राहुल था, उसके पिता अपनी एक दुकान चलाया करते थे, जिससे उनकी अच्छी आमदनी हो जाती थी। राहुल की मां नहीं थी। राहुल बड़ा शर्मीला लड़का था, उसने मुझे कभी हाथ भी नहीं लगाया था। उसके पिता कभी कभी मेरे घर आते थे, मेरी मां से उनकी अच्छी दोस्ती थी। वो मेरी मां के साथ सेक्स सम्बन्ध भी रखते थे। मेरी माँ मौका पा कर उनसे चुदवा लेती थी। मैं उनके इस सम्बन्ध के बारे में कुछ नहीं कहती थी। पर ऐसा सोच कर कि मां कैसे चुदवाती होगी, उनका लण्ड कैसा होगा, मेरे मन भी चुदाने की इच्छा होने लगती थी। मेरी चूत चुदासी हो उठती थी। पर चुदती कैसे, मौका ही नहीं मिलता था।
मुझे एक दिन मौका मिल गया। मेरी माँ मामा जी के यहां दो दिन के लिये गई हुई थी। रात को मैं अकेली सेक्स के बारे में सोच कर उत्तेजित हो रही थी। मेरा जिस्म वासना में जलने लगा था। मेरी चूत में पानी आने लग गया था। मैं बैचेन हो उठी। मैंने चूत में घुसाने के लिये यहा वहा कुछ ढूंढा तो एक लम्बा वाला बैंगन मिल गया। कपड़े उतार कर मैंने उसे धीरे से चूत से लगाया कि मुझे राहुल का ध्यान आ गया। मैंने अपना मोबाईल उठाया और उसे घर आने को कहा। मैंने बस अपने ऊपर एक लम्बा कुर्ता डाल लिया कि नंगापन छिप जाये।
वो छत के रास्ते दबे पांव नीचे आ गया। उसे देख कर मैं खुश हो गई। वो भी बनियान और पजामें में था।
ऐसी हालत में मैंने उसे पहली बार देखा था। उसका शरीर बलिष्ठ था, मसल्स किसी पहलवान की तरह उभरी हुई थी।
“इतनी रात को….क्या बात है…. कोई परेशानी है क्या ?”
“हां राहुल, अकेले डर लगता है, तुम रात को यहीं रह जाओ।”
“तुम्हारे साथ…. यानी लड़की के साथ…. तुम ठीक तो हो ना?”
” राहुल प्लीज, मैं नीचे सो जाउन्गी, तुम यहाँ सो जाना !”
वो सोच में पड़ गया, फिर बोला - “ठीक है मैं अभी आता हूँ, ऊपर लाईट बन्द करके ये आया।”
कुछ ही देर वो वापिस आ गया।
“आ जाओ, इसी पलंग पर आ जाओ, अभी बातें करेंगे, जब नींद आयेगी तो मैं नीचे सो जाउंगी”
हम दोनों एक ही पलंग पर प्यार की बातें करने लगे। मुझे उसका साथ पा कर तरावट आने लगी। मैं पानी लाने के बहाने उसे अपना बदन दिखाने लगी। कभी अपनी छातियाँ उभार कर उसे रिझाती और कभी अपने चूतड़ों को उसके सामने मटकाती। परिणाम सुखद रहा। आखिर उसके लण्ड का उभार पजामे में से उठ कर दिखने लगा।
उसकी आंखो में वासना के डोरे खिंचने लगे। मैंने कमान और कस ली और एक बार नाटक करके अपनी सुडौल चूतड़ की गोलाईयां कुर्ता ऊपर करके अनजान बनते हुये दिखा ही दी। उसका लण्ड कड़क हो कर पजामे में से बाहर आने की कोशिश करने लगा। मुझे अब पता चल गया था कि आज मेरी रात रंग भरी होने वाली है।

मैं टीवी के पास खड़ी थी। राहुल मेरे पास पीछे आ चुका था। उसने मेरी पीठ पर हाथ रख दिया। कुछ होने की आशंका से मेरा मन सिहर उठा। उसने धीरे से मेरी कमर में अपना हाथ कस लिया। उत्तेजना से मेरी आंखें बन्द होने लगी। उसका शरीर मेरी पीठ से चिपक गया।
“ए राहुल, क्या कर रहे हो…. तुम वहाँ बैठो” अब मेरा शरीफ़ों जैसा नाटक आरम्भ हो गया।
“नहीं मधु, मुझे अच्छा लग रहा है….” उसके हाथ अब मेरी छातियों की तरफ़ बढने लगे थे।
“सुनो, तुम्हारा मन मैला तो नहीं हो गया है ना….” मैंने उसकी वासना को उभारा।
“मत पूछो मधु, तुम हो ही इतनी सुन्दर कि…. बस प्लीज….” उसके हाथ मेरे उभारो पर आ चुके थे। मन कर रहा था कि हाय ….बस अब मसल दे….
“राहुल मत करो प्लीज, हाथ हटा लो….” मैंने अपने दोनो हाथ उसके हाथों पर रख दिये पर हटाये नही। उसके हाथ मेरी छातियों को कसने लगे।
“हाय कितने कठोर और मस्त हैं….”
“चलो हटो….” मैंने उसके हाथ हटाये और छिटक कर दूर हट गई,”राहुल, ऐसे नहीं….शादी के बाद….”
“अरे सॉरी, पता नहीं मुझे क्या हो गया था।” उसने तुरन्त माफ़ी मांग ली और हम फिर से बिस्तर पर लेट कर टीवी देखने लगे। अचानक रहुल ने लेटे लेटे ही मुझे दबोच लिया और अपने होंठ मेरे होंठो से चिपका दिये और मेरे ऊपर चढ़ गया। मैं मस्त हो उठी कि अपने आप लाईन पर आ गया। मेरा कुर्ता ऊपर उठा दिया और पजामे में खडा लण्ड मेरी चूत से चिपका दिया।
“राहुल….ये क्या…. हट जा…. देख मेरा कुर्ता ऊपर हो गया है।”
“मधु, पजामा भी मैंने उतार दिया है, बराबर हो गया ना।”
उसका नंगा लण्ड मेरी चूत से रगड़ खाने लगा। मैंने भी चूत को उभार कर उसके लण्ड को बुलावा दिया कि मैं तैयार हूँ।
“मधु, तुम सच में कुदरत की एक कला हो, ऐसा प्यारा जिस्म, प्यारे उभार, और तुम्हारी ये प्यारी सी मुनिया….”
कहते हुये उसने अपना लण्ड मेरी नई नवेली चूत कुंवारी चूत में घुसा डाला।
“मैया री…. मैं मर गई….धीरे से….” मुझे तेज दर्द हुआ। शायद मेरा कुंवारापन जाता रहा था। झिल्ली शायद फ़ट चुकी थी। उसके मुँह से भी एक हल्की कराह निकल गई। शायद राहुल के लन्ड की स्किन भी फ़ट गई थी। पर जोश में लण्ड घुसता ही चला गया। हम दोनों ने एक दूसरे को समाहित कर लिया था। अब हम रुके रहे…. और अपने आप को कंट्रोल करते रहे। फिर धीरे से एक धक्का और लगाया। मैं फिर से चीख उठी। उसने मुझे प्यार से निहारा और चूमने लगा।
“तुम मेरी जान हो मधु, मेरा प्यार हो, तुम्हरे बिना मैं जी नहीं सकता।”
“मेरे राजा, मेरे तुम ही सब कुछ हो, मुझे और प्यार करो, मुझे जन्नत में पहुंचा दो”
उसने अब धीरे धीरे मुझे चोदना चालू कर दिया। मेरी चूत भी का दर्द भी अब शनै: शनै: कम होने लगा। उसकी रफ़्तार बढ़ती गई। मैं अब सुख के सागर में गोते खाने लगी। मेरी कमर भी अब उछाल मार रही थी। लण्ड पूरी गहराई तक मुझे चोद रहा था। जाने कब मैं सुख के सागर में बह गई और मेरी जवानी में उबाल आ गया, और यौवन रस छलक उठा, मेरी चूत भी उसके वीर्य से लबालब भर उठी। हम निढाल हो कर शिथिल पड़ गये।
पर कितनी देर तक पड़े रहते, कामदेव के तीर पर तीर चल रहे थे, जवानी ने फिर अन्गड़ाई ली और दूसरा दौर आरम्भ हो गया। फिर से हम एक दूसरे में समाने लगे, इस बार की चुदाई पहले से लम्बी और ज्यादा सुखद थी।
रात भर जाने दौर चल चुके थे, सवेरे होते होते राहुल चला गया। मेरा मन शान्त था, गहरे समुंदर की तरह कोई हलचल नहीं थी। मैं गहरी नींद में डूबती चली गई।
आंख खुली तो दिन के ग्यारह बज रहे थे। चादर में लगा खून सूख चुका था। मेरे बदन में भी वीर्य और खून के सूखे निशान चिपक गये थे। मैं तुरन्त उठी पर जिस्म दुख रहा था, टूट रहा था, एकदम से मैं लड़खड़ा गई। मैंने चादर बिस्तर पर से खींच ली और लेकर बाथ रूम में आ गई। मैं अच्छी तरह से नहाई और कपड़े साबुन के पानी में भिगा दिये।
माँ आ चुकी थी। मेरी नजरों की चोरी छुपाये नहीं छुप रही थी। मां की अनुभवी आंखों ने सब कुछ भांप लिया था। उस दिन तो वो कुछ नहीं बोली पर मैं समझ चुकी थी कि मां को शक हो गया है। मैंने रात को मां से लिपट कर धीरे धीरे सब बात बता दी। मां को राहुल के बारे में जब पता चला तो उन्होंने चैन की सांस ली।
राहुल के पापा को मनाना मां के लिये सरल था क्योंकि माँ और उसके पिता का तो चुदाई का कार्यक्रम चलता रहता था।
हमारा सच्चा प्यार रंग लाया और सब कुछ ठीक हो गया। एक दिन शादी का समय भी आ गया। इस बीच राहुल और मैं कई बार चुदाई कर चुके थे यानी बहुत सी सुहाग रातें मना चुके थे। ठीक समय पर हमारे घर अब एक लक्ष्मी ने जन्म लिया। हमारी अधूरी जिन्दगी पूर्ण हो गई।
कुवैत से राहुल को काम करने का एक सुनहरा अवसर आया। और कुछ समय के बाद वो कुवैत चला गया। उसकी अच्छी कमाई थी। मेरा घर भरने लगा पर मन खाली खाली रहने लगा। वो साल साल भर बाद आता था। मेरी शरीर की आवश्यकताओं को भी नजर अन्दाज करने लगा, शायद पैसा ही अब उसके लिये सबकुछ हो गया था। अब मेरा मन भटकने लग गया था। राहुल के पिता अब रात भी माँ के साथ बिताने लगे थे। मैं भी रात को लक्ष्मी के सोने के बाद उनकी चुदाई को कैसे ना कैसे करके चोरी से देखती थी, और रात भर तड़पती रहती थी। कभी कभी तो मैं खूब रोती और फिर ये सोच कर रह जाती कि राहुल ने मेरे लिये कितना कुछ किया।
पर एक दिन ऐसा हुआ कि ……..

दिन को मैं अपने कमरे में आराम कर रही थी, एक झपकी लगी ही थी कि किसी ने मुझे दबोच लिया। सुखद आश्चर्य से मैंने आंखे नहीं खोली। शायद भगवान ने मेरी सुन ली थी। उसके हाथ मेरी स्तनों पर आ कर उसे दबाने लगे। जिस्म रोमांच से भर उठा। ये रेगिस्थान में हरियाली कैसी? पर आंख खुलते ही मेरी चीख निकल पड़ी।
वो राहुल के पिता बाबू जी थे…. मात्र चड्डी में थे, उनका लण्ड फ़ुफ़कारें भर रहा था, उनकी आखे वासना में डूबी हुई थी….
मैंने उन्हे धकेलेते हुए कहा,”बाबू जी….ये क्या कर रहे है आप….!”
“भोसड़ी की, चूत सूख जायेगी, चुदवा ले….!”
मैं उनकी भाषा पर सन्न रह गई, ये क्या कह रहे हैं !
“बाबू जी, मैं तो आपकी बहू हूँ…. ऐसा ना करिये !” मैंने उनसे प्रार्थना की।
“साली हराम जादी, तेरी मां को चुदते हुए रोज देखती है, और छिनाल अपनी चूत को हाथ से घिसती है, बाबू जी मर गये थे क्या ?”
अब वो मेरा पेटीकोट खींच रहे थे। उन्होंने अपनी चड्डी उतार फ़ेंकी और मुझे चूमने लगे। उनका मोटा लौड़ा उछल कर बाहर आ गया। मेरी चूंचियाँ सहलाने और दबाने लगे। उनका लण्ड तो बहुत ही मोटा और लम्बा था। मेरी वासना जागने लगी। लम्बे इन्तज़ार के बाद मेरी इच्छा के अनुसार ही ऐसा मस्त लण्ड मिल रहा। उसे हाथ में लेने की इच्छा प्रबल हो उठी। मैंने शरम छोड़ कर उनका लण्ड पकड़ लिया।
“ये हुई ना बात, मेरी जान, ले ले मेरा लौड़ा ले ले, चुदवाले भोसड़ी की….”
“बाबू जी मेरी भी गाली देने की इच्छा हो रही है, दूं क्या मादरचोद गाली तुझे ?”
“मेरी रण्डी, तेरी मां को चोदूं, दे मुझे दे गाली, हरामी, दे गाली, मजा आयेगा।”
“तो भेन चोद मार दे मेरी फ़ुद्दी को, साला मुस्टण्डा लौड़ा, घुसेड़ दे मेरी भोसड़ी में….” मुझे भी आज मौका मिल गया मन की भड़ास निकालने का। मुझे पता था इतना मोटा लण्ड मुझे मस्त करने वाला है। माँ की किस्मत पर मैं जलने लगी कि इतने सोलिड लण्ड से चुदवाती रही और मुझे पूछा तक नहीं। मैं तो राहुल के दुबले पतले लण्ड से ही सन्तुष्ट थी, मेरी मां कितनी खुदगर्ज है चुदवाने के मामले में….।
मेरी चूत को देखते हुए बोले,“ हाय रे मेरी बेटी, इतनी सी मुनिया है रे तेरी तो….और पोंद इतने से?”
“बाबूजी, आज कल लडकियाँ इतनी ही नाजुक होती हैं” मेरी गाण्ड को टटोलते हुए अपना हाथ फ़ेरने लगे।
“मेरी लाडो, जरा गाण्ड तो मेरी तरफ़ कर, इसका भी मजा ले लूं जरा !”
मैं उल्टी हो कर घोड़ी जैसी हो गई और अपने चूतड़ पूरे उभार दिये। बाबू जी का लण्ड तन्ना उठा मेरी गोल गोल गाण्ड देख कर। उन्होंने पास पड़ी क्रीम उठाई और मेरी गाण्ड में भर दी।
“बाबू जी क्या कर रहे हो…. मेरी तो छोटी सी गाण्ड है, अच्छी है ना?”
“मस्त है रे, साली को मचकाने को मन कर रहा है।” और उन्होने अपनी एक अंगुली मेरी गाण्ड में डाल दी। हल्का सा मजा आया।
“हाय रे बाबू जी, मुझे अपनी लौंडी बना लो, अपने पास ही रख लो।”
“हाँ मेरी मधु रानी, तु बहुत ही सुन्दर है, तेरा हर अंग नाजुक है।”
“मुझे आपकी दासी बना लो, मुझे बस चोद डालो अपने मोटे लण्ड से, देखो चूत कितनी प्यासी हो रही है।”
“शाबाश बेटी…. ये हुई ना बात…. अब देख मैं तुझे कैसा मस्त करता हूं”
मेरी गाण्ड की दोनों गोलाईयों को वो सहलाने लगे और उनका मोटा लण्ड गाण्ड के छेद पर लग गया। मैं घबरा उठी, इतनी छोटी सी गाण्ड में इतना मोटा लण्ड। मेरी तो मां चुद जायेगी …. मैंने पीछे मुड़ के देखा, बाबूजी का चेहरा वासना से लाल हो उठा था, उनका लण्ड गाण्ड देख कर कड़क उठा था।

मैंने जल्दी से अपनी गाण्ड को उनके सामने से हटाने की कोशिश की पर उन्होंने अपने हाथों से मेरी कमर कस के थाम ली। लण्ड का सुपाड़ा चिकनाई लगी गाण्ड के छेद पर आ टिका था। अब बाबू जी ने जोर लगाया तो लण्ड नीचे फ़िसल पड़ा।
“ बाबू जी…. ये नहीं करो, नहीं जायेगा।” पर दूसरी बार में मेरी गाण्ड के छेद को फ़ैलाते हुए सुपाड़ा अन्दर घुस पड़ा। मैं चीख पड़ी।
“अरे फ़ाड़ डाली रे मेरी गाण्ड, मादरचोद…. छोड मुझे, हाय रे बाबू जी !” बाबू जी का सुपाड़ा मेरी गाण्ड को चीरता हुआ गहराई नापने लगा।
“बिटिया, इतनी प्यारी पोन्द को मारी नह॥न, तो फिर क्या मजा आयेगा।”
“साले, हरामी, निकाल दे रे लण्ड को बाहर…. मेरी माँ को फोड़ जा कर ….” मुझे असीम दर्द होने लगा। भला हो चिकनाई का जो लण्ड को अन्दर बाहर करने में मदद कर रही थी।
“अब शान्त हो जा मोड़ी, गाण्ड तो मैं छोड़ूंगा नही…. चल भोसड़ी की और झुक जा….” मेरी पीठ को हाथ से दबा कर झुका दिया और लण्ड पेलने लगा। मैं चीखती रही…. उसका लौड़ा अब ठीक से गाण्ड में सेट हो गया था और गाण्ड को चीरता हुआ मजा ले रहा था। मेरे आंसू निकल पड़े…. दर्द के मारे मैं लस्त हो गई। मुँह से आवाज तक निकलना बंद हो गई। मैं अपनी पोंद ऊपर उठाये अपने गाण्ड के छेद को जितना हो सके ढीला करने की कोशिश करती रही ताकि दर्द कम हो। उनके धक्के बढ़ते गये…. मेरी चीखें हालांकि कम हो गई थी पर धक्के के साथ कराह निकल ही जाती थी।
“आज तो मस्तानी गाण्ड का मजा आ गया…. मोड़ी तेरी पोंद तो मजे की है…. देख दो दिन में इसे मेरे लौड़े की साईज़ का कर दूंगा।”
मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। अचानक बाबू जी ने लौड़े का पूरा जोर मेरी ग़ाण्ड में लगा दिया और मैं फिर से एक बार चीख उठी…. बाबू जी का बदन का कसाव बढ गया और अचानक मुझे गाण्ड के अन्दर पानी भरता सा लगा। बाबू जी ने अपना लण्ड बाहर निकाल लिया और पिचकारी हवा में उछाल दी। ढेर सारा वीर्य लण्ड ने छोड़ दिया और मेरी पीठ पूरी चिकनी हो उठी। वीर्य गाण्ड के छेद में और पीठ पर फ़ैल गया था। मुझे अत्यन्त सुखद प्रतीत हुआ कि इतने मोटे लण्ड से निजात मिली। मैं बिस्तर से लग गई और आंखे बंद कर ली और गहरी सांसें लेने लगी। बाबूजी ने चादर से ही अपना वीर्य साफ़ कर दिया।
“चुद गई मेरी बेटी…. मधु मजा आया ना?” मां ने कमरे में आते हुए कहा।
“हाँ मेरी बिटिया…. तेरी माँ ही ने मुझे तुझे चोदने के लिये कहा था, तेरी तड़प इससे सही नहीं जा रही थी।” बाबू जी ने रहस्य खोला। मैं चौंक उठी, पर मां ने मेरी भावनाओं का ख्याल रखा, मुझे बहुत अच्छा लगा।
” मां, आप मेरा कितना ध्यान रखती हैं …. पर देखो ना बाबू जी ने मेरे साथ क्या किया !” मैंने शिकयत की और अपनी पोंद दिखाई।
“अरे मादरचोद, मेरी बेटी की तो तूने गाण्ड मार दी, अपने मोटे लण्ड का ख्याल तो रखा होता….” माँ ने गुस्सा होते हुए कहा।
“मैं क्या करूँ, तेरी बेटी की पोंद इतनी मस्त थी कि उसे मारनी पड़ी, मेरा लौड़ा भी तो साला गाण्ड देख कर ऐसा भड़क उठता है कि बस….” बाबू जी ने अपनी मजबूरी जताई।
“साला कमीना, देख गाण्ड की क्या हालत कर दी है….”
“छोड़ ना मां, चाहे लगी हो, पर बाबू जी का लण्ड मस्त है…. अब तो मैं रोज ही चुदाऊंगी।” मैंने मां को समझाया। चाहे जो हो बाबू जी का लण्ड मस्त था, उसे मैं कैसे छोड़ती।
मां ने मुझे गले लगा लिया…. “मुझे भी तो इनके लण्ड का चस्का लगा हुआ है ना…. साला भरपूर चोदता है….मस्त कर देता है”
बाबू जी अपनी तारीफ़ सुन कए इतराये जा रहे थे…. और फिर उन्होने मां को दबोच लिया। और उसके ऊपर चढ़ गये।
रंडी, अब उठा ले अपनी टांग…. लौड़ा तैयार है….” मां कसमसाती रही पर चुदाई चालू हो गई थी। मां नीचे दबी हुई सिसकारियाँ भर रही थी, और बाबू जी चोदते रहे…….. पेलते रहे…. मां की चुदती रही, मैं मां को मस्त होते देखते रही….
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मैं उस समय कॉलेज में पढ़ती थी। मेरा एक बॉय-फ़्रेंड था सुधीर, जो मेरा क्लासमेट था। मेरे और उसके बीच सम्बंध तीन महीने से था। सुधीर एक छ्ह फ़ुट का खूबसूरत लड़का था। साफ़, गोरा रंग पर पढ़ने में कोई खास नहीं था, एक औसत विद्यार्थी था।
मैं अपनी स्कूटी से कॉलेज जा रही थी, तभी सुधीर ने आवाज लगाई,”कामिनी…. एक मिनट…….. !”
मैंने पलट कर देखा तो सुधीर दूर पान की दुकान पर कुछ लड़कों के साथ खड़ा था, जो पहनावे से ठीक नहीं लग रहे थे। सुधीर भागता हुआ आया
“सुनो …. आज तो मैं कॉलेज नहीं जाउंगा…. पर कल सुबह जरूर मिलना….!”
“क्यों….कल क्या है?…. और ये लड़के कौन हैं जो तुम्हारे साथ हैं….?”
“परसों मेरी बहन और मां आ रही हैं…. कल घर में कोई नहीं है…. गप्पे मारेंगे …. फिर परसों के बाद कोई चांस नहीं है….!”
“सच…. तो कल कॉलेज…. गोल….!! ” मैंने अपनी स्कूटी आगे बढ़ा दी….वो वापिस अपने दोस्तों में चला गया। उसका घर यहां से पास ही था। मैं खुश हो गई, काफ़ी दिनो बाद सुधीर ने अपने घर आने को कहा था। मैं कॉलेज में भी और फिर घर पर भी अपने और सुधीर के बारे में सोचती रही। मुझे यह सोचना बड़ा अच्छा लग रहा था कि हम अकेले में क्या क्या बातें करेंगे। कहीं अकेले में वो मुझे छेड़ेगा तो नहीं…. क्या करेगा …. और मैं उसके साथ प्यार कैसे करूंगी…. सोचते हुए ही रोंग़टे खड़े हो रहे थे….।
दूसरे दिन सुधीर उसी पान वाले की दुकान के सामने मिल गया…. वही अपने कुछ अजीब से दोस्तों के साथ। मुझे देख कर वो भागता हुआ आया और मेरी स्कूटी पर बैठ गया।
“पीछे मुड़ो और सामने वाला घर मैंने किराये पर ले रखा है….!”
मैं उस घर में एक बार पहले भी आ चुकी थी। पर उस समय उसकी मां और बहन भी थी। मैंने अन्दर स्कूटी रखी इतनी देर में सुधीर ने घर का ताला खोल दिया। अब हम दोनों घर के अन्दर थे। अन्दर आते ही उसने मुझे चूतड़ों के नीचे से हाथ का ग्रिप बना कर ऊपर उठा लिया। उसके मुँह से बीड़ी की या कुछ और चीज़ की दुर्गंध आई।
” छि: छि: अपना मुँह धो कर आओ….बल्कि ब्रश भी करो….!”
उसे मेरा कहना अच्छा नहीं लगा….पर उसने ब्रश करके मुह को साफ़ कर लिया।
“बस अब तो ठीक है ना….!” मुस्करा कर उसने अपनी बाहें फ़ैला दी। मैं उसके पास जाकर उससे लिपट गई।

“हां….अब देखो कितने अच्छे लग रहे हो….” मैंने उसे चूम लिया। एकबारगी मुझे लगा कि सुधीर कोई नशा किये हुए है। उसकी आंखो में मुझे वासना के डोरे तैरते नजर आये। मुझ पर भी धीरे धीरे वासना क रंग चढ़ने लगा। हम एक दूसरे को बुरी तरह चूमने लगे। वो मेरे अंगों को दबाने लगा। मेरी चूंचियाँ कड़ी हो गई। मैं मदहोश होने लगी। मेरी चूत गीली होने लगी थी।
“कामिनी…. आज कुछ करें…. मेरा मन बहक रहा है….!”
“मेरे राजा…. मेरा मन भी बहक रहा है…. कुछ करो ना….”
सुधीर ने अपना हाथ मेरी टॉप के अन्दर डाल दिया और मेरी चूंचियाँ दबा दी। उसका लण्ड भी मुझे चोदने के लिये उतावला हो रहा था। उसके कड़े लण्ड को मैंने अपने अपने हाथ में भींच लिया। उसके मुख से आह निकल गई। मैं भी बेकाबू होती जा रही थी।
“….ये पैण्ट तो उतारो…. बड़ा तड़प रहा है बेचारा……..!”
सुधीर ने अपना पैंट उतार दिया….फिर कमीज और बनियान भी उतार दिया। इतनी देर में मैंने भी अपनी जीन्स उतार दी और टॉप भी उतार दिया। अब हम दोनों बिल्कुल नंगे खड़े थे। उसका शरीर देख कर मैं उत्तेजित हो उठी। खास करके उसका कठोर और तन्नाया हुआ लण्ड देख कर मेरी चूत फ़ड़क उठी। उसके लण्ड को पकड़ कर सुपाड़े की चमड़ी मैंने ऊपर खींच दी। उसका लाल सुपाड़ा चमक उठा। उसने अपने बिस्तर पर मुझे बैठा दिया…. फिर हम दोनों किस करते हुए बिस्तर की चौड़ाई पर लेट गये। मेरे मन में आनन्द की हिलौरे आने लगी, मैं मन ही मन में चुदाई के लिये बेताब हो उठी… मेरे दोनों पांव नीचे ही थे। सुधीर ने नीचे खड़े हो कर ही अपना लंड मेरी चूत पर रख दिया। मैंने अपनी चूत थोड़ी सी फ़ैला दी। उसने अपना लण्ड मेरी चूत पर रख दिया और हौले से अन्दर घुसा दिया। मैं आनन्द से भर गई। उसने अब एक ही धक्के में पूरा लण्ड अन्दर घुसा डाला। मुझे थोड़ी सी तकलीफ़ हुई…. पर सहन कर गई।
“सुधीर…. धीरे धीरे डालो ना….!”
पर वो अब कहां सुनने वाला था। उसने तो एकदम से ही तेज धक्के चालू कर दिये। मुझे अब तो वास्तव में लगा कि वो नशे में है….उसके मुख से अब कुछ तेज गन्ध आने लगी थी। जो मेरे आनन्द को रोक रहा था। उसकी आँखों में लाल डोरे बढ़ गये थे। जाने मुझे आज मजा नहीं आ रहा था। उसके चोदने में नरमाई बिलकुल नहीं थी…. मुझे तकलीफ़ भी हो रही थी…. । ऐसा लगा कि ना जाने क्यों आज सुधीर बहुत अधीर था और शायद जल्दी में नजर आ रहा था….
“सुधीर…. रुको…. कोई चिकनाई लगा लो….!”
पर उसकी सांस फूलने लगी थी….शायद वो थक गया था। अचानक ही उसका वीर्य छूट पड़ा। और उसने मेरी चूत के अन्दर ही वीर्य छोड़ दिया।
कामिनी - 2
सुधीर जैसे ही हटा मुझे अचानक ही एक चेहरा और दिखा…. वो भी नंगा खड़ा था और उसका लण्ड भी तन्ना रहा था। उसने एकदम से मुझे जकड़ लिया। मेरी समझ में कुछ आता उसके पहले उसने मुझे जकड़ लिया।
मैं अपने शरीर को झटके दे कर छुड़ाने की कोशिश करने लगी। पर ये प्रयास बेकार साबित हुआ। ना जाने वो कमरे में कब आया और उसने अपने खुद के कपड़े कब उतार लिये, मुझे पता ही नहीं चला। मैं तो सुधीर की चुदाई का आनन्द ले रही थी, मेरी तो आंखे बन्द थी…. ये कब आ गया …. तभी उसका लण्ड मेरी चूत में घुसता सा लगा…. उसका लण्ड बहुत मोटा था…. झटके से उसने जोर का धक्का मारा और उसका लण्ड मेरी चूत में घुस गया। उसका लण्ड मोटा और खुरदरा था। मेरी तंग चूत में उसका लण्ड रगड़ता हुआ गहराई तक बैठ गया। मुझे तेज दर्द हुआ, मेरे मुख से चीख निकल गई। उसी समय सुधीर ने मेरे दोनों हाथ कस कर पकड़ लिये…. मुझे कुछ समझ में नहीं आया….सब कुछ बुरे सपने जैसा लग रहा था।
कामिनी की इस घटना को दो दिन बीत गये थे। इन दो दिनों में मैं सुधीर से दो बार मिल चुका था। कामिनी के कारण उससे मेरी भी दोस्ती थी। मैंने उसे यह नहीं मालूम होने दिया कि कामिनी की चुदाई के बारे में मुझे मालूम है। आज सवेरे ही मैंने सुधीर के घर जाने की योजना बनाई। इस बारे में मैंने नेहा को बता दिया था कि सुधीर की मां और बहन आई हुई हैं, उनसे मिलने जा रहा हूँ।
मैं कॉलेज जाने से पहले उसके घर चला गया। बाहर बरामदे में एक सुन्दर सी लड़की झाड़ू लगा रही थी। मैंने अन्दाज़ा लगाया कि यह सु्धीर की बहन होगी। जैसे ही मैं फ़ाटक के अन्दर घुसा …. उसने मेरी तरफ़ देखा और देखती ही रह गई।
मैंने उसे नमस्ते किया तो वो कुछ नहीं बोली। मैं सामान्यतया मुस्कुराता रहता हूँ,”मैं सुधीर का दोस्त हूँ …. ”
“जी …. आईये …. ” वो कुछ शरमाती सी बोली। मुझे वो अन्दर ले गई और कहा - “आप बैठिये …. मैं पानी लाती हूँ।”
“आप उसकी बहन है ना ….” मैंने मुस्कराहट बिखेरते हुए कहा।
वो एकदम से शरमा गई …. और मुझे तिरछी निगाहों से देखती हुई अन्दर चली गई। उसकी पतली छरहरी काया और उसके उभार और कटाव भरे पूरे थे। किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकते थे। वो पानी ले कर आ गई।
“आपका नाम जान सकता हूँ ….?”
उसका अन्दाज़ कुछ अलग सा था। मुझे लगा कि वो उमर में सुधीर से बड़ी है।
इतने में एक मधुर अवाज और आई,”ये मेरी मम्मी है …. मै सुधीर की बहन हूँ …. दिव्या ….!”
मैं बुरी तरह से चौंक गया …. ये कैसे हो सकता है? “जी ….माफ़ करना …. आप तो इतनी छोटी लगती है कि …. मैं तो समझा कि ….!”
“आप ठीक कह रहे हैं …. मेरी कम उम्र में ही शादी हो गई थी …. फिर ये भी एक एक्सीडेन्ट में गुजर गये थे ….” (उसका मुझे घूरना बन्द नहीं हुआ।) वो एकटक मुझे देखे जा रही थी।
“ओह!!! …. माफ़ करना …. यह सुन कर दुख हुआ …. पर आप तो दिखने में किसी लड़की जैसी ही लगती हैं ….” वो फिर से शरमा गई ….
“आप चाय पीजिये …. इतने में सुधीर आ जायेगा ….!” उसके हाव भाव ये बता रहे थे कि मैं उसे अच्छा लग रहा हूँ …. मैंने सोचा कि और आगे बढ़ा जाये !
“आप अभी ही इतनी सुन्दर लग रही हैं तो जब बाहर जाती होगी तो और भी अच्छी लगती होंगी ….!” उसका चेहरा लाल हो उठा। बिल्कुल किसी कुंवारी लड़की की तरह वह अदाएँ दिखा रही थी। फिर से उसने मुस्कराते हुए मुझे देखा …. मेरी हिम्मत बढ़ने लगी। वो सामने किचन में चली गई। मैं भी उसके पीछे पीछे किचन में आ गया।
मैंने हिम्मत करके उसकी कमर पर हाथ रखा। उसने तुरन्त ही पलट कर मुझे देखा और बोली- “यह क्या कर रहे रहे हो ….”
“सॉरी मैं अपने आपको रोक नहीं पाया, क्योंकि आप में गजब का आकर्षण है !”
वो मुस्करा दी। मेरी हिम्मत और बढ़ गई।
“आप बहुत खूबसूरत हैं …. ” उसके चेहरे पर पसीन छ्लक आया।
“आप भी तो हैं …. हाय” उसके मुँह से निकल पड़ा। मेरे हाथ उसकी चिकनी कमर पर फ़िसलने लगे। उसका शरीर कांप उठा, वो लरजने लगी और झूठ में ही मेरे से दूर होने की कोशिश करने लगी।
“जी ….चाय ….” उसका चेहरा तमतमा रहा था ….हम चाय ले कर फिर से बैठक में आ गये ….”आपका नाम क्या है ….?”
“मेरा नाम जो हन्टर है ….और आपका ….?”
“जी ….म….मैं सरोज ….” वो हिचकती हुई सी बोली …. “आप दिव्या को रोज पढ़ाने आयेंगे ना …. ऐसा सुधीर कह रहा था ….!” मैं सकपका गया। क्योंकि पढ़ाने की बात मुझे नहीं पता थी।
“मै आपको सरोज ही कहूँगा …. क्योंकि आपको आण्टी कहना आपके साथ ज्यादती होगी !” सुनते ही उसने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।
“पर वो दिव्या ….?”
“हां …. हां मैं आ जाऊंगा ….उसे भी पढ़ा दूंगा” मैंने मौके को हाथ से गंवाना उचित नहीं समझा। मैंने चाय समाप्त की और खड़ा हो गया। वो भी खड़ी हो गई और मेरे समीप आ गई। मैंने इधर उधर देखा कि कोई नहीं है तो मैंने सरोज का हाथ पकड़ लिया। वो खुद ही धीरे से मेरे सीने से लग गई। मैंने उसे लिपटाते हुए अपनी बाहों में कस लिया। उसने अपना चेहरा ऊपर उठा लिया और अपनी आंखे बन्द कर ली। मुझे कुछ समझ में नहीं आया पर मेरे शरीर में तरावट आने लगी थी, वासना जागने लगी थी। स्वत: ही मेरे होंठ आप ही उसके होंठो की ओर बढ़ गये। कुछ ही देर में हम दोनों एक दूसरे के होंठ चूस रहे थे। मैंने अब उसके उरोजो को थाम लिया। वो कसक उठी।
“हाय …. मत करो …. सीऽऽऽ …. हाय रे” उसके मुख से सिसकारी निकल पड़ी। मैंने धीरे धीरे उसके स्तन दबाने और मसलने चालू कर दिये। उसकी बाहों का कसाव और बढ़ चला था। अब मैंने एक हाथ से उसके चूतड़ दबाने शुरू कर दिये थे। अब उसका भी एक हाथ मेरे लण्ड पर आ चुका था और कस कर पकड़ लिया था।
“हाय …. छोड़ दो ना …. आऽऽऽऽह …. क्या कर रहे हो ….?” इन्कार में इकरार था ….मेरा लण्ड उसने कस के पकड़ रखा था। कह तो रही थी छोड़ने को और बेतहाशा लिपटी जा रही थी। बाहर फ़ाटक की आवाज आई तो वो मेरे से छिटक के दूर हो गई ….
“कल सवेरे नौ बजे आना …. मैं इन्तज़ार करुंगी ….!” इतने में दिव्या अन्दर आ गई। एकबारगी तो वो ठिठक गई …. शायद उसने माहौल भांप लिया था। मैंने अब दिव्या को निहारा। वो एक जवान लड़की थी …. जीन्स पहने थी …. अपनी मां की तरह चुलबुली थी …. तो इसे पढ़ाना है …. लगा कि मेरी तो किस्मत अपने आप ही मेहरबान हो गई है …. आया था कि इन पर इम्प्रेशन जमा कर पटाऊंगा। पर यहां तो सभी कुछ अपने आप हो रहा था। मैं मुस्करा कर बाहर आ गया।
अगले दिन सवेरे नौ बजे मै सुधीर के यहाँ पहुंच गया। सुधीर कहीं जाने की तैयारी कर रहा था।
“थेंक्स यार …. तुमने दिव्या को पढ़ाने के लिये हां कर दी …. मैं जरा हेप्पी से मिलने यहीं पान की दुकान तक जा रहा हूँ ….” कह कर वो चला गया।
दिव्या मेज़ पर बैठी पढ़ाई कर रही थी। मुझे देखते ही उसने अपने पास ही एक कुर्सी और लगा दी।
अन्दर से सरोज ने मुझे देखा और शरमाती हुई मुस्करा दी …. दिव्या ने फिर से एक बार इस बात को देख लिया। मैं कुछ देर तक तो पढ़ाता रहा …. फिर मुझे महसूस हुआ कि उसका ध्यान पढ़ाई पर नहीं मेरी ओर था।
“मुझे मत देखो …. …. इधर ध्यान लगाओ ….” पर दिव्या ने सीधे वार करते हुए मेरी जांघ पर हाथ रख दिया ।
“आपने कल मम्मी को किस किया था ना ….” वो फ़ुसफ़ुसाई, मैं बुरी तरह से चौंक गया।
“क्या ??? ….क्या कहा ….” मैं हड़बड़ा गया.
“मम्मी ने मुझे बताया था …. मैं और मम्मी सब बातें एक दूसरे को बताती है …. मुझे भी किस करो ना ….” मुझे एक बार तो समझ में नहीं आया कि ऐसे मौके पर क्या करना चाहिये……उसके हाथ मेरे लण्ड की तरफ़ बढ रहे थे। मेरे शरीर में सनसनी फ़ैल रही थी। अचानक वो मेरे से लिपट पड़ी। दरवाजे से सरोज सब देख रही थी। मेरी नजर ज्योंही दरवाजे पर पड़ी सरोज ने अपनी एक आंख दबा कर मुस्करा दी। मैंने इसमें उसकी स्वीकृति को समझा और दिव्या का कुंवारा शरीर मेरी आगोश में आ गया।
उसकी उभरती जवानी पर मेरे हाथ फ़िसलने लगे। वो बेतहाशा अब मुझे चूमने लगी। मेरा हाथ उसकी स्कर्ट में घुस पड़ा। उसकी चूत गीली हो चुकी थी। मैंने उसकी पेन्टी में हाथ डाल कर उसकी चूत दबा दी। जवाब में उसने भी मेरा लण्ड दबा दिया। सरोज ने अन्दर से इशारा किया तो मैंने उसे छोड़ दिया। दिव्या लगभग हांफ़ते हुए अलग हो गई। उसकी आंखो में वासना के लाल डोरे लगे खिंच चुके थे। सरोज चाय बना कर ले आई।
“दिव्या ….कॉलेज में देर हो जायेगी …. तैयार हो जाओ ….” सरोज ने दिव्या को आंख मारते हुए कहा। दिव्या मुस्कराते हुए उठी और लहरा कर चल दी। वो समझ चुकी थी कि मम्मी अब गरम हो चुकी है अब उन्हें चुदाई चाहिये। मैंने चाय समाप्त की और प्याला मेज़ पर रख दिया।
“सरोज …. जरा सा और पास आ जाओ ….” मैंने आज मौके का भरपूर फ़ायदा उठाने की सोचते हुए अपनी मनमोहक मुस्कराहट बिखेर दी। उसकी आंखें झुक गई। पर उठ कर चुप से मेरी गोदी में बैठ गई। जैसे ही वो मेरी जांघो पर बैठी उसके चूतड़ो का स्पर्श हुआ। वो अन्दर पेन्टी नहीं पहने थी। उसके लचकदार चूतड़ का स्पर्श पा कर मेरा लण्ड फ़ुफ़कार उठा। हम दोनों अब एक दूसरे को चूम रहे थे। मेरा हाथ जैसे ही उसके बोबे पर पड़ा …. उसके बोबे बाहर छलक पड़े। उसके ब्रा भी नहीं पहनी थी ….यानि चुदने के लिये वो बिल्कुल तैयार थी। मेरा लण्ड उसके चूतड़ों पर लगने लगा था। कुछ ही देर में वो बैचेन हो उठी ….
“सुनो जी …. अब देरी किस बात की है ….”कह कर वो बुरी तरह लाल हो गई। मैं उसकी इस अदा पर मर गया …. मैंने उसे गोदी में से उतार कर खड़ा कर दिया और अपनी पेन्ट उतार दी …. वो शरम से सिमटी जा रही थी …. पर उसने बिस्तर पर आने की देर नहीं की। उसके मन की हलचल मैं समझ रहा था ….लगता था बरसों की प्यासी है ….।
मेरा लण्ड देखते ही वो मचल उठी। उसने मेरा लण्ड अपने हाथो में ले लिया और पकड़ कर दबाने लगी …. लण्ड की चमड़ी ऊपर नीचे करने लगी, इसके कारण मेरा सुपाडा रगड़ खाने लगा ….मुझे तेज मजा आया ….मीठी मीठी सी गुदगुदी उठने लगी । उसने मेरी तरफ़ देखा …. मैं उसे प्यार से देख रहा था ….
“हाय रे ….मेरी तरफ़ मत देखो ना …. उधर देखो ….” और शरमाते हुए मेरे सुपाड़े को अपने मुँह में भर लिया। दोनों हाथो से मेरे चूतड़ भींच लिये और पूरा लण्ड मुँह में भर कर अन्दर बाहर करने लगी। सुपाड़ा जोर से चूस रही थी ….एक तरह से अपने मुँह को चोद रही थी। मेरे मुख से आह निकल रही थी …. कुछ देर तक यही सिलसिला चलता रहा।
उसने फिर कहा-”सुनो जी ….अब देर किस बात की है …. ” फिर से एक बार शरमा गई और फिर वो कहने लगी, “तुम्हे देखते ही मुझे लगा कि तुम मेरे लिये ही बने हो ….तुम्हारे में गजब की कशिश है !”
“सरोज तुम बहुत सेक्सी हो …. देखो मुझे कैसे बस में कर लिया ….”
“मैं बहुत महीनों से प्यासी हूँ ….और मेरी बेटी …. उसकी नजरें भी भटकने लगी थी …. मैंने उसे रंगे हाथो पकड़ लिया था …. तब से मैंने उसे अपना राजदार बना लिया और अब हम सही लड़का देख कर दोनों ही अपनी प्यास शान्त करती हैं ….”
मुझे उसकी बातों से कोई सरोकार नहीं था …. मुझे तो एक बदले दो दो चूत बिना मांगे ही मिल रही थी।
वो कहती जा रही थी ….”सुधीर से मैं परेशान रहती हूँ ! वो जाने क्या करता है? जाने कहां से नशे की चीज़े लाता है और बेचता है …. हमारे मना करने पर वो हम दोनों को पीटता है ….।”
सरोज की सारी बातें मैं ध्यान में रख रहा था पर उसे यही दर्शा रहा था कि मैं सेक्स में ही रुचि ले रहा हूँ।
“बस सरोज अब चुप हो जाओ, मैं अब से तुम्हारे साथ हूँ …. मजे लो अब ….मेरा देखो न कितना बुरा हाल है ….” मैंने उसकी चूत पर अपना तन्नाया हुआ लण्ड का दबाव देते हुए कहा। उसका शरीर वासना से कसक रहा था। उसकी तड़प मुझे महसूस हो रही थी। मैंने उसके बोबे दाबते हुए नीचे जोर लगाया …. लण्ड चूत में उतरता चला गया। उसकी कसी हुई चूत मेरे लण्ड के चारों ओर मीठा सा घर्षण दे रही थी। उसने अपनी चूत को और ऊपर की ओर उभार ली। मेरा लण्ड अभी भी थोड़ा बाहर था। उसके मुख से सिसकारी निकलती जा रही थी। मुझे लगा कि मेरा लण्ड उसकी चूत की पूरी गहराई में घुस चुका था। पर लण्ड अभी भी बाहर था।
“अब धीरे से बाहर निकाल कर अन्दर और दबाओ ….” उसने सिसकते हुए कहा।
मैंने अपना लण्ड थोड़ा सा बाहर निकाला और अन्दर और दबा दिया। उसे हल्का स दर्द हुआ …. फिर भी बोली,”ऐसा और करो ….”
“पर आपको दर्द हो रहा है ना ….?”

इसी दर्द में तो मजा है ….पूरा घुसेगा तो ही शान्ति मिलेगी ना ….!” उसने दर्द झेलते हुए कहा।
मैंने फिर से लण्ड दबाया …. पर इस बार झटके से पूरा डाल दिया। उसके मुख से हल्की सी चीख निकल गई।
“हाय रे ….! मर गई ….! ये हुई ना मर्दो वाली बात …. ! बस अब थोड़ा रुको ….!” वो अपने स्टाईल में बताते हुए चुदवाने लगी।
उसने कहा,”अब मेरी चूतड़ के नीचे तकिया रख दो …. फिर बस एक धक्का और ….”
“देखो बहुत दर्द होगा ….”
“आज होने दो ….बिना दर्द के मजा नहीं आता है ….”
मैंने उसकी गाण्ड के नीचे तकिया घुसा दिया , उसकी चूत ऊपर की ओर उठ गई और मैंने इस बार पूरा जोर लगा कर लण्ड को चूत में गड़ा दिया। दर्द से उसने दांत भींच लिये और मैंने अब उसके बोबे थामें और मसलते हुए धीरे धीरे पर गहराई तक चोदने लगा। वो पसीने में नहा चुकी थी। उसका सारा बदन उत्तेजना से कांप रहा था। मैं भी अपना आपा खोता जा रहा था। उसकी टाईट चूत मेरे लण्ड को लपेट कर सहला रही थी।
उसने कहा,”राजा …. तेजी से चोदो ना ….आज मुझे मस्त कर दो ….”
मेरे धक्के तेज होते गये। उसकी सिसकारियाँ बढ़ती गई। वो अपने पूरे जोश से अपने चूतड़ हिला हिला कर चुदवा रही थी। अचानक मुझे लगा कि उसका कसाव मेरे पर बढ़ गया है …. और वो झड़ने लगी।
मैंने उस ओर ध्यान नहीं दिया ….और चुदाई जारी रखी। झड़ कर भी वो उसी जोश में चुदवाती रही …. मैंने उसे चूम चूम कर उसका चेहरा अपने थूक से गीला कर दिया था। वो भी बराबरी से मुझे चाट रही थी। अचानक उसने मुझे इशारा किया और वो मेरे ऊपर आ गई। आसन बदल लिया। वो मेरे पर झुक गई और लण्ड चूत में घुसा कर जबरदस्त धक्के मारने लगी। उसके बोबे जोर जोर से उछल रहे थे। मैंने दोनों बोबे को कस के मसलना शुरू कर दिया। उसके धक्के इतने जबर्दस्त थे कि उसे भी शायद तकलीफ़ हो रही होगी। लगता था जन्म-जन्म की प्यास बुझाना चाहती थी।
कुछ ही देर में मैं भी चरमसीमा पर पहुंच गया और और चूत के अन्दर ही लण्ड ने अपनी पिचकारी छोड़ दी। वो कब झड़ गई मुझे पता नहीं चला। पर हाफ़ते हुए मेरे पर लेट गई। उसका जिस्म पसीने में तर था। हम दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए कुछ देर पड़े रहे। फिर मैं धीरे से उठा।
“सरोज तुम तो चुदाई में मस्त हो …. मेरा सारा माल निकाल दिया ….” सरोज फिर से शरमा गई।
“मैं तो दो बार झड़ गई …. हाय राम …. मेरा पेटीकोट तो दे दो ….” उसने झट से कपड़े पहन लिये।
मैंने भी कपड़े पहने और पूछा,”बाथरूम किधर है ….” उसने उंगली से इशारा कर दिया। मैं बाथरूम में गया और अपना मुख धो लिया ….तभी मेरी नजर हैंगर पर टंगे जैकेट पर पड़ी। वो सुधीर का था। मैंने तुरन्त उसकी तलाशी ली। उसमें कोई शायद नशे की कोई चीज़ थी। उसमें एक पिस्तौल भी था। सारी चीज़े यथावत रख कर मैं बाहर आ गया।
“अच्छा अब मैं चलता हूँ ….” उसने मुस्करा कर हामी भर दी ….
मैं जैसे ही बाहर निकला, मेरा मन एकदम धक से रह गया, दिव्या एक कुर्सी पर बैठी कोई मेग्ज़ीन देख रही थी।
“त् ….त् …. तुम ….कॉलेज नहीं गई ….?”
“और यहां की चौकीदारी कौन करता ….??? …. कल आओगे ना ….” उसने एक सेक्सी नजर डालते हुए कहा।
“कल ….तुम्हारी बारी है …. तैयार रहना ….!” मै धीरे से झुक कर बोला…
उसकी मुस्कान और झुकी झुकी नजरें उसकी स्वीकृति दर्शा रही थी ….।
समय देखा साढ़े दस बज रहे थे …. मैंने अपनी मोटर साईकल उठाई और सीधे पुलिस स्टेशन पहुंचा। अंकल मेरा ही इन्तज़ार कर रहे थे।
मैंने उन्हें एक एक करके सब बताना शुरु कर दिया,”अंकल, सुधीर के अलावा, हैप्पी, सुरजीत और मोन्टी है, चारों एक ही गांव के है …. हेप्पी टूसीटर चलाता है और नशे की चीजें बेचता है। मोन्टी किसी एजेन्ट से ये नशीली चीज़े लाता है। सुरजीत अवैध दारू के पाऊच लाता है और पानवाले के पास रखता है। सुधीर के पास भी घर पर ये नशे की चीज़े हैं और एक पिस्तौल भी है। और …. ….”सारी रिपोर्ट बताता रहा और रिपोर्ट देने के बाद मैंने उनसे एक दिन का समय और मांगा।
अंकल ने सारी बाते समझ ली थी। अंकल शहर के एस पी थे ….उन्हें शक तो पहले ही था पर नेहा के कहने पर उन्होंने कार्यवाही का वचन दिया था। उन्होंने जरूरी बातें अपनी डायरी में नोट कर ली।
मैं यहाँ से सीधा कामिनी से मिलने नेहा के घर चला आया था …. आज वो बहुत बेहतर लग रही थी …. चल फिर रही थी …. उसमें ताकत आ गई थी।
मैंने जब अपनी बात उसे बताई तो वह सन्तुष्ट नजर आई, पर खुद को रोने से नहीं रोक पाई। अंतत: वो फ़फ़क के फिर रो से पड़ी।
मैं पुलिस स्टेशन से बाहर आया और अपनी मोटर साईकल उठा कर सीधे सुधीर के घर आ गया। अभी सवेरे के साढ़े आठ ही बजे थे….हमेशा की तरह सुधीर घर पर नहीं था। उसे शायद यह मालूम नहीं था कि आज उसका इस घर में अन्तिम दिन है। घर में सरोज नहीं थी….दिव्या ही मिली।
“आज तो जल्दी आ गये…. क्या हुआ रात को नींद नहीं आई क्या….?” उसकी चुलबुली हरकत मेरे मन को बहुत अच्छी लगी।
“दिव्या ….बस रात को तो मैं तुम्हारे ही सपने देखता रहा …. तुम्हारे जैसी कमसिन और जवान लड़की जिसे मिल जाये….उसकी तो किस्मत ही खुल जाये….” मेरी बात सुन कर वो और इठलाने लगी।
“अब अन्दर भी चलो…. ” मुझे वो धक्का देते हुए बोली….”बोलो अब क्या इरादा है….!”
“बस एक मीठा सा चुम्मा….” मैंने शरारत से कहा।
“है हिम्मत तो ले लो….!” उसने हंस कर कहा।
“ऐसे नहीं …. पहले अपनी आँखें बंद करो….फिर देखो मेरा कमाल….”
उसने अपनी आँखें बन्द कर ली और अपना गोरा और चिकना चेहरा आगे कर दिया…. मैंने उसके होंठ पर अपने होंठ रख दिये…. उसके कांपते होंठो का स्पर्श मुझे रोमांचित कर गया। एकदम नरम होंठ….गुलाब की पंखुड़ियों की तरह ….। हम दोनों एक दूसरे के होंठो को चूसने लगे….दोनों ही मदहोश होने लगे। कुछ देर बाद अलग हुए तो दोनों के चेहरे की रंगत बदली हुई थी। मेरा लण्ड खड़ा हो चुका था। उसकी आंखों में भी गुलाबी डोरे खिंच चुके थे।
दिव्या ने थोड़ा सा शर्माते हुए और फिर से आँखें बन्द करके कहा,”जो ….मेरी छातियों को पकड़ लो….हाय…. मसल डालो….” उसने अपनी छाती आगे को उभार दी, उसके तने हुए उरोज बाहर को उभर आये। मैंने उसकी चूंचियो पर अपना हाथ रख दिया। और हौले हौले से दबाने लगा। उसके मुख से सिसकारी निकलने लगी। वो भी मेरे हाथों पर ज्यादा दबाने के लिये और दबाव डालने लगी। मैंने उसकी कमर में हाथ डाल कर एक हाथ से उसके उभारों को मसलना शुरू कर दिया और अब मेरी कमर वाला हाथ चूतड़ों के ऊपर आ कर थम गया। मेरे हाथ उसके बोबे और चूतड़ दबा रहे थे और दिव्या अपने जिस्म को मेरे जिस्म से बल खा कर रगड़ रही थी। उसके मुँह से आह….हाय….मां री…. जैसी सिसकारियाँ निकल रही थी। मैंने उसे दीवार से सटा कर उसकी चूत को पकड़ कर दबा दी। वो चिहुंक उठी….
“हाय छोड़ दे जोऽऽऽ…. मैं मर गई….” वो मदहोश सी झूम गई। मैंने उसकी चूत नहीं छोड़ी ….स्कर्ट के बाहर से ही उसकी चूत मसलता रहा…. उसकी चूत पानी छोड़ रही थी….मेरे हाथ को गीलापन लगने लगा था।
वो मस्ती में झुकने लगी….पर उसने मेरा हाथ नहीं छुड़ाया….”क्या कर रहे हो जोऽऽऽ…. मुझे मार डालोगे क्या ???…. अब बस अब….नहीं रहा जा रहा है….” उसकी उत्तेजना बहुत बढ़ गई थी।…….. बेहाल हुई जा रही थी….।
मैंने उसे अपनी बाहों में उठाया और प्यार से उसे बिस्तर पर लेटा दिया। उसकी आँखेंं बंद थी। मैंने उसका स्कर्ट ऊपर कर दिया….उसकी पानी छोड़ती हुई गीली चूत सामने थी। गुलाबी रंग…. हल्की भूरी भूरी झांटे…. चूत के दोनों लब फ़ड़फ़ड़ा रहे थे…. मैंने अपनी पैन्ट उतार दी…. और अपना मोटा और तन्नाया हुआ लण्ड उसकी पनीली चूत पर रख दिया। चिकनापन इतना था कि रखते ही सुपाड़ा अन्दर घुस पड़ा और छेद में उतर गया।
“घुसा दे रे…. हाय…. जरा जोर लगा दे ….जो….” उसकी बैचेनी बढ़ रही थी…. पूरा लण्ड लेने को उतावली हो रही थी…. मैं उस पर झुक पड़ा….और जोर लगा कर लण्ड अन्दर सरकाने लगा। वो भी अपनी चूत का पूरा जोर लगा रही थी। जब दोनों और बेकरारी बराबर हो तब भला तेजी को कौन रोक सकता था। वो भरपूर जवान….खिलती हुई कली…. पूरा जोश…. नतीजा ये कि धक्का पर धक्का…. गजब की तेजी…. चूत का उछाल…. लण्ड को सटासट चला रहा था। मैंने उसके बोबे भींच लिये….
“और जोर से भींचो …. मेरे राजा…. चोद दो आज मुझे….!” उसकी वासना बढ़ती जा रही थी…. मेरा लण्ड पूरी गहराई तक पहुंच रहा था…. उसकी चूत जवान थी ….कोई भी लण्ड पूरा ले सकती थी। मेरा लण्ड भी मानो कम लम्बा लग रहा था।
अचानक मेरे चूतड़ पीछे से किसी ने दबा दिये…. मैंने देखा तो सरोज थी….चुदाई के जोश में वो कब आई पता ही नहीं चला। उसने मुझे इशारा किया। मैंने समझ गया…. मैंने तुरन्त ही दिव्या के बोबे जोर जोर से मसलने और खींचने लगा। उसने भी मेरे चूतड़ दबाना चालू रखा।
“जो मत करो….मैं झड जाऊंगी…. हाऽऽऽय ना करो……..” पर मैंने बेरहमी से दिव्या के बोबे मसलना जारी रखा…. और धक्के चूत में गड़ा कर मारने लगा। उसे जबर्दस्त चुदाई चाहिये थी।
“मैं मर गई….राम रे…. चुद गई…. मेरी फ़ाड़ डाल जो…. हाय मैं गई……..” उसके जिस्म में उबाल आ गया था। उसे नहीं पता था कि उसकी मां उसके पास खड़ी है। मेरी उत्तेजना भी बहुत बढ़ गई थी…. पर अब दिव्या का शरीर ऐंठने लग गया था। वो मुझे अपनी ओर जोर से खींचने लगी थी। अचानक उसने पूरी ताकत से मुझे चिपका लिया और उसकी चूत लहरा उठी। वो झड़ने लगी थी। सरोज ने दिव्या का जिस्म जोर जोर से सहलाना शुरु कर दिया था। उसकी चूत का कसना और ढीला होना….उसका पानी छोड़ना मुझे बहुत सुहाना लग रहा था। सरोज बराबर उसका जिस्म सहलाये जा रही थी।
“झड़ जा बेटी…. निकाल दे पूरा पानी….” सरोज उसे प्यार से कह रही थी।
“मांऽऽऽ …. हाय मेरी मां ऽऽऽ …. तेरी बेटी तो चुद गई…. जो ने तो मेरा दम निकाल दिया….” दिव्या हांफ़ते हुए बोली। मैंने अपना लण्ड दिव्या की चूत से बाहर निकाल दिया।
“लेकिन मेरा लण्ड तो देखो ना….अभी तक ये फ़ुफ़कार रहा है…. सरोज तुम ही शान्त कर दो….” मैंने अपनी बात भी कही…. दिव्या भी अब बिस्तर से उठ चुकी थी।
“जो….मम्मी की गाण्ड मार दो…. मां की गाण्ड बहुत नरम है….!” अचानक दिव्या ने मुझे सुझाया।
सरोज ने शरम से अपना मुख छिपा लिया। मैंने सरोज को तुरन्त घोड़ी बना दिया। और साड़ी खींच दी। सरोज की गोरे गोरे चूतड़ों की दोनों फ़ांके सामने आ गई। सरोज ने अपनी दोनों टांगें फ़ैला कर अपने गाण्ड का छेद खोल दिया। फिर मुझसे शर्माते हुए बोली,”हाय ….मत करो जो….मैं मर जाऊंगी….” फिर दिव्या की तरफ़ देखा -” दिव्या तू जा ना यहाँ से….”
“मां, मेरे सामने ही गाण्ड चुदवा लो ना….! मुझे भी तो एक इसका एक्स्पीरीएन्स चाहिये ना….!”
“चल हट…. बेशरम….तेरे सामने चुदूंगी तो शरम नहीं आयेगी?”
“मैं भी तो आपके सामने चुदी थी ना….जो लग जाओ ना अब….” दिव्या ने पास पड़ी तेल की शीशी से तेल मां की गाण्ड में लगा दिया….”अब चोद दो मां की गाण्ड को….!”
मुझे लगा कि बस स्वर्ग है तो यहीं है…….. मां बेटी मुझसे इतने उत्साह से चुदवा रही थी….मैं तो सातवें आसमान पर पहुंच गया। मैंने अपना लण्ड सरोज की गाण्ड के छेद पर लगा दिया और जोर लगाया, छेद में तेल भरा हुआ था मेरा सुपाड़ा फ़क की आवाज करता हुआ छेद में फ़ंस गया।
“उईऽऽ….मां…. हाय रे….घुस गया…. !” सरोज सिसक उठी। दिव्या अपनी मां के बोबे पकड़ कर धीरे धीरे मलने लगी और प्यार करने लगी।
“जो…. मेरी प्यारी मां को तबियत से चोदो…. मां को आनन्द से भर दो…. देखो ना मां को कितना अच्छा लग रहा है….” दिव्या मां की ओर प्यार से देख रही थी। सरोज ने अपनी आँखें बन्द कर ली थी। मैं अब अपना लण्ड जोर लगा कर अन्दर सरकाने लगा। मेरे लण्ड को छोटे से छेद में घुसने के कारण तेज मीठा सा सा मजा आने लगा। पर सरोज ने अपने दांत भींच लिये। उसे हल्का सा दर्द हो रहा था। दिव्या मां को मजा देने के लिये उसके बोबे मसल रही थी। मेरा लण्ड गाण्ड में पूरा घुस चुका था। सरोज ने मुझे मुड़ कर देखा और आंख मार दी….
“लण्ड है या लोहा…. मेरी तो फ़ाड़ के रख दी…. अब मारो ना जोर से गाण्ड को….”
मैंने हरी झण्डी पाते ही स्पीड बढ़ा दी। वो सिसक उठी। मजे में उसकी फिर आँखें बन्द होने लगी।
“चोद दे मेरी मां को…. प्यार से भर दो मां को…. मेरी प्यारी मां….” अब दिव्या सरोज को चूमने लगी थी। बोबे पर तो दिव्या ने कब्जा जमा रखा था। मैंने कमर में हाथ डाल कर उसकी चूत में अपनी अंगुली डाल दी। और डबल चुदाई करने लगा। उसका दाना मसलने लगा। उसे तेज मजा आने लगा।
“हाय रे छोड़ दे अब रे…. लगा ….जोर से लगा…. मेरी मांऽऽऽ…. मार दी रे मेरी….” सरोज ना जाने क्या क्या कहती रही। उसकी गाण्ड अब मक्खन की तरह चिकनी हो गई थी। लण्ड सटासट चल रहा था। अति उत्तेजना से उसका दाना अचानक ही फ़ड़फ़ड़ा उठा और सरोज झड़ने लगी। ये देख कर कर दिव्या ने भी मां को कस लिया। मैंने भी झड़ने के चक्कर में स्पीड बढ़ा दी। मेरा सुपाड़ा फ़ूल कर कुप्पा हो रहा था। सहनशीलता सीमाएं पार करती जा रही थी और आखिर अन्तिम पड़ाव आ ही गया। मैंने तुरन्त अपना लण्ड बाहर निकाल लिया। दिव्या ने देखते ही देखते मेरे लण्ड को मुठ्ठी में भर लिया और कस कर दबा कर मुठ मार दिया। मेरे लण्ड ने पिचकारी लम्बी और दूर तक उछाल दी।
“हाय मम्मी….देखो तो…. माल तो फ़व्वारे की तरह निकल रहा है….”
सरोज ने बिना समय गवांये झट से मेरा लण्ड मुख में भर लिया…. अब वीर्य सरोज के मुख में भर रहा था…. और वो उसे एक ही घूंट में पी गई। अब वह बचे खुचे वीर्य को भी निचोड़ रही थी…. दिव्या अपनी मां की इस हरकत को ध्यान से देख रही थी….
“मम्मी….ये क्या गन्दापना कर रही हो…. इसे भी कोई पीता है क्या ?”
मैंने दिव्या को समझाया कि ये तो पौष्टिक होता है और आनन्ददायक होता है…. दिव्या ने कपड़े से मां की गाण्ड का तेल पोंछ दिया फिर मेरा लण्ड भी साफ़ कर दिया। सरोज ने दिव्या को गले लगा लिया। और चूमने लगी….
“देखा जो….माँ को तुमने मस्त कर दिया…. मुझे बहुत अच्छा लगा….मेरी प्यारी मांऽऽ … ” कह कर सरोज से अलग हो गई।
मैंने सरोज से बात पलटते हुए कहा - “आज सुधीर नहीं दिख रहा है….?”
“वो चारों आज शाम को गांव जा रहे हैं न…. देर से आयेगा….” सुनते ही मैं चौकन्ना हो गया।
“अब तो वो तुम दोनों को पीटता तो नहीं है ना….”
” वो जंगली है…. कल देखो मुझे कितना मारा…. दिव्या के तो बोबे तक नोच डाले…. साला मरता भी तो नहीं है….हमारी जिन्दगी नर्क बना रखी है” कह कर सरोज ने मेरे सीने पर सर रख दिया। दिव्या भी मां की पीठ से चिपक कर रोने लगी। तो सच में वो इतना निर्दयी और क्रूर है।
मैंने उन्हें अलग करते हुए कहा….”मुझे अब चलना चाहिये….शाम को आऊंगा।” मैं मुड़ कर बाहर आ गया। वो दोनों मुझे प्यार से निहारते रही।
मैं तुरन्त पुलिस स्टेशन गया और अंकल से मिला…. उन्हें सब कुछ बताया…. कि वो सभी गांव जाने की तैयारी में है।
“शायद उन्हें भनक लग गई है…. चलो….” उन्होने जीप तैयार की और सभी सिपाहियो को आज्ञा दी। मैंने अपनी बाईक उठाई और उनके आगे आगे चला। पान-वाले की दुकान पर पहला छापा मारा। मैंने भाग कर टूसीटर पर बैठे मौन्टी और सुरजीत को जा दबोचा। मौन्टी ने मुझे पीछे धक्का दे दिया और मौके की नजाकत देख कर भागने लगा। मैंने उछल कर एक फ़्लाईंग किक मार कर उसे गिरा दिया। इतने में दो पुलिस वालों ने उन्हें धर दबोचा। हैप्पी का पीछ करके अंकल ने उसे हथकड़ी पहना दी। पान की दुकान को सील कर दी। जीप वहां से कॉलेज पहुंची। मुझे सुधीर पर नजर रखने को कहा और साथ में दो पुलिस वालों को भी हिदायत दी। अंकल प्रिन्सिपल से मिलने ओफ़िस में चले गये। कुछ ही समय में अंकल और प्रिन्सिपल सुधीर की क्लास के सामने थे। सुधीर देखते ही समझ गया और खिड़की से कूद कर भागने लगा। पर खिड़की के बाहर मुझे देखते ही उसके होश उड गये। उसे हथकड़ी डाल दी गई। समय पर पूरा अभियान निपट गया। चारों दोस्तों को और पान वाले को हवालात में बंद कर दिया गया। अब चला तलाशी अभियान ।
पुलिस मेरे साथ सबसे पहले सुधीर के यहाँ पहुंची। सुधीर भी साथ था। दिव्या और सरोज ने मुझे और सुधीर को पुलिस के साथ देखा तो घबरा गई।

“साब इसने कुछ नहीं किया…. जो तो अच्छा लड़का है….” अंकल ने मेरी तरफ़ देखा।
“क्या बात है जो…. बड़ी तरफ़दारी हो रही है…. ये लो…. अब इसका ध्यान रखना वरना साले की थाने में इसकी टांगें तोड दूंगा….” अंकल में मेरी तरफ़ गुस्से में देखा और मुझे सरोज की तरफ़ धक्का दे दिया।
“जी…. जी…. मैं ध्यान रखूंगी….” घबराई सी सरोज मेरा हाथ पकड़ कर खड़ी हो गई।
“साली ….हरामजादी….जो के साथ खड़ी है…. आने तो दे मुझे….तुम दोनों मां बेटी के हाथ पांव ना तोड़े तो देखना !”
मैंने सुधीर के कान में कहा….”तू फ़िकर मत कर यार…. मैं तेरी मां और बहन को रोज़ चोदूंगा…. मस्त चीज़ें है दोनों….”
“भड़वे…. तेरी तो मैं…. ” उसी समय अंकल का एक हाथ उसके मुँह पर पड़ा…. उसके होंठो से खून छलक पड़ा। मैंने सुधीर की तरफ़ मुस्करा कर देखा…. “तू क्या समझा था…. कामिनी के साथ तूने जो किया था…. वो चुपचाप बैठती….” अब उसकी नजरें ऊपर उठी…. वो समझ चुका था…. कि ये सब क्यों हुआ है…. उसका सर एक बार फिर झुक गया।
“आगे से अगर ये जो…. सुधीर के साथ दिखा तो साला जेल जायेगा….” अंकल अपने डायलोग बोले जा रहे थे। सरोज और दिव्या को अब भी कुछ समझ में नहीं आया। उनकी नजर में बस सुधीर एक अपराधी था। कामिनी का बदला उन दोनों के समझ में नहीं आया था। इतने में पुलिस वाले सारे घर की तलाशी ले कर कुछ समान ले कर आ गये। उसे वहीं पर सील कर दिया और हम तीनों के उस पर हस्ताक्षर करवा लिये।
वो मुझे छोड़ कर आगे तलाशी अभियान में निकल गये। मैं अंकल की अदाओं पर मुसकरा उठा। सरोज और दिव्या मुझसे प्यार करके लिपट कर रोने लगे। मैंने उन्हें समझाया
“मैं कोई चोर थोड़े ही हूँ…. मुझे तो बस इन्होंने यहां से निकलते देखा तो पकड़ लिया…. हां सुधीर ड्रग्स बेचने के चक्कर में पकड़ा गया है जाने कितने सालों के लिये अन्दर जायेगा।
उन दोनों ने सुधीर से पीछा छूटने पर चैन की सांस ली…. उनकी नजर में मैं पुलिस से बच गया और मुझे प्यार से बिस्तर पर सुला दिया। दोनों एक एक करके मुझे प्यार करने लगी…. अचानक मुझे कामिनी का ख्याल आया।
“मैं शाम को आऊंगा…. रात भर मजे करेंगे…. बाय….” मैं सीधा वहां से कामिनी के पास आया। उसे सारी बात बताई…. कामिनी खुश थी…. उसने मुझे प्यार से चूम लिया….
“बात कहां तक पहुंची…. कार्यक्रम चालू है….?” कामिनी और नेहा ने मुस्करा कर पूछा्।
“दोनों ही बहुत सेक्सी है…. खूब मजा आता है और अब तो दोनों ही मेरी फ़ेन है…. क्यों जल गई ना….” मैंने शरारत की नजरो से देखा।
दोनों ने मुझे पकड़ लिया और मेरी पिटाई शुरू कर दी….